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Wednesday, September 4, 2019

September 04, 2019

समय

समय 

अरे मन  तू फिर दुखी हो गया 
अभी-अभी तो ठीक था तू 
फिर अब क्या तुझे हो गया 
क्या कुछ ऐसी बातें हो गयी 
जो तेरे दिल में टाई सी गड़ गयी 
बता क्यों तेरे इन आँखों में 
पानी की बुँदे पड़ गयी 
सोच में यूँ डूब गया तो फिर 
क्या तू सोच पायेगा 
समय न होता है किसी का 
तू उसका क्या कर पायेगा 
सुख-दुःख तो जीवन के हैं दो पहिये 
ये तो आते जाएंगे दुःख का पहिया आगे लगा है 
तो ये आगे आएगा ,
और फिर ख़ुशी के पल दिखलायेगा 
अतः रे मन तू खुद को दुखी न कर 
जा वापस तू अपने घर 
जा वापस तू अपने घर  

कवि :- सुनील कुमार 
समय



                                                                                            
September 04, 2019

पहली मुलाकात

पहली मुलाकात 


फूल भी  झुक  गए शर्म  से 
वो जो गुजरे बगिया के राहों  से 
कहते है हम झूठ अगर तो
कोई पूछ ले इन हवाओं से
घटाएं जो ढल रही थीं कालामय होकर 
उनके चेहरे की चमक को देखकर 
वो भी अपना रंग बदल रही हैं
मुर्झायी हुई कलियाँ भी अब नरम हो रही हैं
शुक्र है उनसे मेरी मुलाकात ही कम हुई 
दुःख तो कम हुआ उनसे बिछड़ने का
बस थोड़ी सी आँखे ही नम हुई 
अब नहीं मिलती ख़ुशी भी इन नजारों से 
क्योकिं उठ गयी है डोली उनकी 
कोई पूछ ले इन कहारों से.

                                                                                                            कवि:-सुनील कुमार



Tuesday, September 3, 2019

September 03, 2019

यादें


यादें 

आती हैं यादें  सताती  हैं यादें 
बिखरे लम्हों को समेटता हुं तो 
आँखों से आँसू छलकाती है यादें 
सुना- सुना सा रहता है ये मन,सुनी है ये दीवारें  
चुपके से कानो में आकर बताती है यादें 
छूटा अपना साथ, दिल पे लगा आघात  
तब से हर पल नींद को 
आँखों से जगाती है यादें 
छिपती -छिपाती होठों  पर आकर 
किसी न किसी को सुनाती है यादें 


यादें                                              
                                                              
                         









  कवि:-सुनील कुमार                                                          
September 03, 2019

मेरी कविता


मेरी कविता

अक्ल सोच रही है कविता लिखना सीखूँ            
पर पता नहीं समझ में किसपे क्या लिखुँ   
दादा की तारीफ पे लिखुँ,या चैपल की हर पे 
सनी की आवाज पे लिखुँ,या पापा कि मार पे 
बेटियों के भर पे लिखुँ,या लाइफ के दिन चार पे 
अक्ल सोच रही है कविता लिखना सीखूँ            
पर पता नहीं समझ में किसपे क्या लिखुँ 
गुरु ग्रेग को मारा चांटा,
बिकने लगा है अब मिलावटी आटा 
लेने लगा हूँ  अब मै  भी  खर्राटा 
इस पर मम्मी ने है मुझको डाँटा 
अक्ल सोच रही है कविता लिखना सीखूँ            
पर पता नहीं समझ में किसपे क्या लिखुँ 
कोयल की कुक पे लिखुँ,या रोटी की भूख पे 
सूरज की धुप पे लिखुँ,या धरती के रूप पे 
गरीबों पे दुख लिखुँ,या अमीरो के सुख पे 
अक्ल सोच रही है कविता लिखना सीखूँ            
पर पता नहीं समझ में किसपे क्या लिखुँ 
कश्मीर की सुंदरता पे लिखुँ,या विज्ञान  की हैरानी पे 
चोर की चतुरता पे लिखुँ,या शमशान की वीरानी पे  
पूर्वजों  की आदरता पे लिखुँ,या शहीदों कुर्बानी पे 
देश  रही निरक्षरता पे लिखुँ, या ममता  की कहानी पे 
ढेर सारे विकल्प है इतने जिसपे कलम को, 
फिर भी अक्ल सोच रही है कविता लिखना सीखूँ            
पर पता नहीं समझ में किसपे क्या लिखुँ।
मेरी पहली कविता
                                                                     






     
कवि:-सुनील कुमार


September 03, 2019

बचपन


बचपन

भूल गए वो दिन जब हम भी बच्चे थे 
सभी के आँखों के तारे पर अक्ल के कच्चे थे  
हमने भी सीखा था उंगली पकड़ के चलना 
आये आँखों में आँसुओं को इन हाथों से मलना 
मचलती है ये आंखे उस बचपन को देखने को 
पर इस स्मृति के आगे मेरी चलती है एक ना ...........





                                                                                                       कवि:-सुनील कुमार
September 03, 2019

मेरा सफर

 कैसे भूलूं मैं ये सफर
 मेरा सफर पहला सफर
 कैसे भूलूं मैं ये सफर
 दो फूलों की खुश्बुओं का
 छाया रहा मुझपर असर
 नजर को अपनी आवाज़ बनाकर
 करती रहीं बातें मुझसे
 पर मै था अपनी धुन में खोया
 मई था उनसे बेखबर

मेरा सफर पहला सफर

 कैसे भूलूं मैं ये सफर

आँखों में है उनकी तस्वीर
कानो में गूजती है उनकी आवाज़ 
 दुःख तो है बस इस बात का  
मै न जानू उनका आवास
 उनकीं याद ढा रही है मुझपर कहर
 ये जीवन कहीं बन जाये न एक ज़हर
  क्या करुं ऐ हमसफर
 तू ही है मेरा पहला सफर


मेरा सफर पहला सफर
 कैसे भूलूं मैं ये सफर

 कवि:-सुनील कुमार
September 03, 2019

ख़ामोशी

ख़ामोशी ही ख़ामोशी है मेरे इस संसार में
कौतुहल है कहीं ना मेरे इस घरबार में

एक पल में ही हो गयी सारी उम्मीदें तबाह
हर वर्ष हर मौसम है ना जाने क्यूँ हमसे खफा खफा
दुःख की बदली है रही है
मेरे इस खुराफात पर
आंखे है पर भटक रहा है
मेरा जीवन अंधकार में

ख़ामोशी ही ख़ामोशी है मेरे इस संसार में
कौतुहल है कहीं ना मेरे इस घरबार में

लाखों की भीड़ में थोड़ी सी खुशी न तलाश कर सका मैं
हर घड़ी हर समय ना जी सका हूँ मैं और ना ही मर सका हूँ मै
क्या कहें अब कहा जाता नहीं
दर्द है इतना की अब सहा जाता नहीं

इसलिए-
ख़ामोशी ही ख़ामोशी है मेरे इस संसार में
कौतुहल है कहीं ना मेरे इस घरबार में।


 कवि:-सुनील कुमार